CGPA से इंटर्नशिप नहीं मिली, फिर भी माइक्रोसॉफ्ट में 90 लाख का पैकेज – नमन बंसल की प्रेरक कहानी

By Arman

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आजकल कई छात्र सोचते हैं कि अच्छी नौकरी पाने के लिए कॉलेज में ऊंचे नंबर या हाई CGPA बहुत जरूरी है। लेकिन नमन बंसल की कहानी बताती है कि स्किल्स, मेहनत और सही दिशा से कम अंकों वाले छात्र भी बड़ी कंपनियों में पहुंच सकते हैं। नमन ने जयपी इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (JIIT) नोएडा से बीटेक किया। उनका कुल CGPA सिर्फ 6 था। इस वजह से कॉलेज में उन्हें एक भी प्लेसमेंट ड्राइव में बैठने का मौका नहीं मिला। आज वही नमन माइक्रोसॉफ्ट में SDE-2 के पद पर काम कर रहे हैं और उनकी सालाना सैलरी लगभग 90 लाख रुपये है।

कम CGPA ने बंद कर दिए थे रास्ते

नमन ने 2016 से 2020 के बीच कंप्यूटर साइंस में बीटेक पूरा किया। कम अंकों के कारण कंपनियां उन्हें इंटर्नशिप या जॉब के लिए कॉल नहीं करती थीं। यहां तक कि एडोब जैसी कंपनी ने भी कम CGPA की वजह से इंटर्नशिप के लिए रिजेक्ट कर दिया था। कई छात्र ऐसी स्थिति में हिम्मत हार जाते हैं, लेकिन नमन ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने रिज्यूमे में CGPA को कम महत्व दिया और उन चीजों पर फोकस किया जिनमें वे अच्छे थे।

स्किल्स पर दिया पूरा ध्यान

नमन कंपिटिटिव प्रोग्रामिंग में बहुत मजबूत थे। उन्होंने कोडफोर्सेस प्लेटफॉर्म पर कैंडिडेट मास्टर रैंक हासिल की थी। उन्होंने डेटा स्ट्रक्चर, एल्गोरिदम, डायनामिक प्रोग्रामिंग, C++, Go, MySQL और अन्य टेक्निकल स्किल्स को मजबूत किया। रिज्यूमे में उन्होंने कॉलेज, ब्रांच और प्रोग्रामिंग स्किल्स को हाइलाइट किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने उन चीजों पर ध्यान केंद्रित किया जिनमें वे अच्छे थे।

एक रेफरल के जरिए उन्हें मेकमाईट्रिप में इंटर्नशिप मिल गई। यह उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। मेकमाईट्रिप का अनुभव उनके रिज्यूमे को मजबूत बना गया। इसके बाद उन्हें डीई शॉ (एक बड़ी इन्वेस्टमेंट फर्म) में फुल-टाइम जॉब मिल गई।

एडोब ने पहले रिजेक्ट किया, बाद में नौकरी दी

कुछ साल अनुभव हासिल करने के बाद वही एडोब, जिसने पहले इंटर्नशिप के लिए मना कर दिया था, उन्हें मेंबर ऑफ टेक्निकल स्टाफ के पद पर रख लिया। नमन ने एडोब में करीब दो साल काम किया। इसके बाद दिसंबर 2022 में वे माइक्रोसॉफ्ट में शामिल हो गए। आज वे वहां SDE-2 के रूप में काम कर रहे हैं और उनकी कुल सैलरी पैकेज करीब 90 लाख रुपये प्रति वर्ष बताई जा रही है।

इस कहानी से क्या सीख मिलती है?

नमन बंसल की जर्नी साफ दिखाती है कि:

  • कम CGPA शुरुआती बाधा तो बन सकता है, लेकिन यह अंतिम फैसला नहीं है।
  • स्किल्स और प्रैक्टिकल नॉलेज आज की दुनिया में ज्यादा मायने रखते हैं।
  • कंपिटिटिव प्रोग्रामिंग और प्रोजेक्ट्स रिज्यूमे को मजबूत बनाते हैं।
  • रेफरल और नेटवर्किंग से अच्छे अवसर मिल सकते हैं।
  • रिजेक्शन को हार न मानकर आगे बढ़ना चाहिए।

कई छात्र सोचते हैं कि टियर-1 कॉलेज या हाई मार्क्स के बिना अच्छी कंपनी में जाना मुश्किल है। नमन की कहानी साबित करती है कि ऑफ-कैंपस अपॉर्चुनिटीज, मेहनत और सही स्किल्स से बड़ी कंपनियों में जगह बनाई जा सकती है।

आज के समय में कंपनियां सिर्फ डिग्री या नंबर नहीं देखतीं। वे देखती हैं कि आप प्रॉब्लम सॉल्व कर सकते हैं या नहीं, कोडिंग कितनी अच्छी है और रियल वर्ल्ड में काम करने की क्षमता कितनी है। नमन ने ठीक यही किया। उन्होंने अपनी कमजोरी को छुपाया नहीं, बल्कि ताकत पर फोकस किया।

निष्कर्ष

नमन बंसल की सफलता की कहानी हर उस छात्र के लिए प्रेरणा है जो कम अंकों या रिजेक्शन की वजह से निराश है। CGPA महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन यह सब कुछ नहीं है। अगर आप स्किल्स पर मेहनत करते हैं, प्रोग्रामिंग का अभ्यास करते हैं और मौकों को पकड़ते हैं तो बड़ी कंपनियां जैसे माइक्रोसॉफ्ट भी दरवाजा खोल सकती हैं। नमन की तरह अपनी ताकत पर ध्यान दें, लगातार सीखते रहें और हिम्मत न हारें। सफलता जरूर मिलेगी।

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