उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। विपक्षी इंडिया गठबंधन, खासकर समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस, अपनी रणनीति बदल रहे हैं। दोनों पार्टियां दलित और पिछड़े वर्ग (ओबीसी) के युवाओं को जोड़ने पर जोर दे रही हैं। सामान्य सीटों पर भी इन युवाओं को जिम्मेदारी सौंपी जा रही है।
इंडिया गठबंधन का नया प्लान क्या है
भाजपा और उसके सहयोगी दल अपनी सरकार के कामों का प्रचार कर रहे हैं और जातिगत समीकरण साध रहे हैं। विपक्ष भी हर सीट पर अपना गणित बिठाने में लगा है। सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन लगभग तय माना जा रहा है।
दोनों पार्टियों ने समाजवादी और आंबेडकरवादी विचारों वाले युवाओं को चुना है। इन युवाओं को अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी जा रही है। उनका काम है विचारधारा से जुड़े युवाओं को पार्टी से जोड़ना और पिछड़े, दलित व अल्पसंख्यक (पीडीए) गठजोड़ को मजबूत करना।
सामान्य सीटों पर दलित युवाओं को मौका
सपा और कांग्रेस ने कई दलित युवाओं को सामान्य सीटों पर प्रभारी बनाया है। यह नया दांव है। इससे पारंपरिक वोटबैंक मजबूत होगा। बसपा से नाराज युवा भी इन पार्टियों की तरफ आकर्षित हो सकते हैं।
सपा ने इन युवाओं को जिम्मेदारी दी है:
- ऊंचाहार में मनोज पासवान
- बाबागंज में शिवशंकर सरोज
- कौशांबी-फतेहपुर में राम करन निर्मल
- मधुबन से विनीत कुशवाहा
- कुशीनगर से राहुल राज
कांग्रेस ने इन युवाओं को युवाओं को जोड़ने का काम सौंपा है:
- बलिया से शैलेंद्र ध्रुव यादव
- वेल्थरा रोड से मुरली मनोहर
- बिलग्राम से सुभाष पाल
- गौरा से तरुण पटेल
ये नाम दिखाते हैं कि पार्टियां सिर्फ आरक्षित सीटों तक सीमित नहीं रहना चाहतीं। सामान्य सीटों पर भी दलित और पिछड़े चेहरे उतारकर वे व्यापक सामाजिक आधार बनाने की कोशिश कर रही हैं।
बसपा में ब्राह्मण नेताओं का कटना
दूसरी तरफ, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती पार्टी को बचाने के लिए फिर से ब्राह्मणों पर दांव लगाने की तैयारी में हैं। लेकिन पार्टी के कई बड़े ब्राह्मण नेता लगातार उन्हें छोड़ रहे हैं। हाल ही में अंटू मिश्रा का निष्कासन इसकी मिसाल है।
पिछले एक दशक में कई ब्राह्मण नेता बसपा से दूर हो गए। इनमें उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक, पूर्व मंत्री नकुल दुबे, रंगनाथ मिश्रा, विनय शंकर तिवारी और राकेश पांडेय जैसे नाम शामिल हैं। 2007 में बसपा ने 80 से ज्यादा ब्राह्मणों को टिकट दिए थे, जिनमें से 41 जीते थे। लेकिन अब पार्टी की वह सामाजिक इंजीनियरिंग कमजोर पड़ती जा रही है।
युवाओं पर फोकस क्यों जरूरी
2027 के चुनाव में युवा वोटरों की भूमिका बहुत बड़ी होगी। सपा और कांग्रेस समझ रहे हैं कि दलित और ओबीसी युवाओं को जोड़कर वे बसपा के पारंपरिक वोटबैंक को तोड़ सकते हैं और भाजपा के खिलाफ एक मजबूत मोर्चा बना सकते हैं। पीडीए फॉर्मूला 2024 के लोकसभा चुनाव में काफी हद तक सफल रहा था। अब उसे विधानसभा चुनाव में और मजबूत करने की कोशिश हो रही है।
यह रणनीति सिर्फ वोट पाने की नहीं, बल्कि लंबे समय तक सामाजिक आधार बढ़ाने की है। दोनों पार्टियां युवाओं को जिम्मेदारी देकर उन्हें पार्टी का हिस्सा बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति और युवा दोनों ही निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इंडिया गठबंधन का यह नया तरीका 2027 के चुनाव का नतीजा तय करने में अहम साबित हो सकता है।

